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श्रेष्ठता की भावना व जाति आधारित वोटबैंक की राजनीति के चलते हिंदू समाज में बढ़‌ रहा है जातिगत् मतभेद

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सुल्तानपुर। भारत सरकार द्वारा सुचीबद्ध संस्था मानव अधिकार संरक्षण व पत्रकार एकता संघ के राष्ट्रीय प्रभारी डी पी गुप्ता एडवोकेट ने शहर के प्रतिष्ठित डॉक्टर ए के अग्रवाल के आवास पर जोधपुर से पधारे प्रसिद्ध संत स्वामी ओम चैतन्य जी से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया और उन्हें अपने न्यूज़ आर्टिकल्स संग्रह बुक को भेंट किया। इस दौरान अपने वार्तालाप के दौरान स्वामी ओम चैतन्य जी ने वर्तमान समय में हिंदू धर्म में व्याप्त जातिवाद पर सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि जातिवाद का आधार धर्म नहीं है बल्कि मानव निर्मित सामाजिक और परंपरागत व्यवस्था है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों का वर्णन करते हुए उन्होने कहा कि जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् भवेत् द्विज:। वेद पाठात् भवेत् विप्र: ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मण:।।- स्कन्द पुराण,नागर खण्ड 18/6 अर्थात जन्म से सभी शूद्र अर्थात अनस्किल्ड पैदा होते हैं। संस्कार धारण करने पर द्विज हो जाते हैं। वेद का अध्ययन करने पर विप्र और ब्रह्म को जान लेने पर ब्राह्मण होते हैं। वैदिक शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को जाने। इस पर भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 41वां श्लोक में भगवान का स्पष्ट निर्देश है कि ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।। अर्थात हे परन्तप ! ब्राह्मणों , क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म, स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं। इस पर विचार करने पर ये प्राप्त होता है कि भगवद्गीता के अनुसार समाज आधारित जाति व्यवस्था में सेवा कार्य अर्थात सर्विस करने वाले को शूद्र और खेती-बाड़ी, गौ पालन व व्यापार करने वाले को वैश्य तथा सैन्य शासन संबंधित कार्य करने वाले को क्षत्रिय कहा जाता है। इसी प्रकार शम, दम, तप, शुद्धि, क्षमा, सरलता व निष्कपटता, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य के गुणों को धारण करने वाला ही ब्राह्मण कहलाता है। व्यवहारिक जगत में हिंदूओं में जो ठाकुर ब्राह्मण वैश्य शूद्र वर्ण की जो व्यवस्था दिखती है ये परंपरा और लोक व्यवहार से उत्पन्न हुई है। चूंकि हमारा समाज लोक परंपराओं का पालन बहुत ही कट्टरता से करता है इस कारण वह अपनी जातिगत सरनेम को भी कठोरता से पकड़े रहता है और कठोर जातिवादी व्यवस्था से निकलने की बजाय उसी को महिमामंडित करने में लगा रहता है। जब तक हम खुद जातिवादी सरनेम वाली व्यवस्था को अस्वीकार्य नहीं करेंगे तब तक यह कुरीति समाज को ग्रसित किये रहेगी। विदित हो कि आज का हिंदू समाज विशेष तौर पर उ प्र , बिहार में जितनी अधिक तरक्की कर रहा है उतना अधिक जातिवादी भावना उसमें मजबूत हो रही है। इसका प्रमुख कारण धर्म पर आरोपित करना ग़लत है क्योंकि ये जातिगत विद्वेष कृत्रिम रूप से राजनैतिक नेताओं द्वारा फैलायी जा रही है जिसमें कहीं श्रेष्ठता की भावना तो कहीं ओबीसी एससी एसटी आरक्षण खत्म होने की अफवाह इसे बलवती बना रहें हैं।

D P Gupta
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