सनातन धर्म में पंच देव और उनके अवतार के सिवा किसी और का पूजन शास्त्र विरूद्ध आचरण है
डी पी गुप्ता
सुल्तानपुर। हाथरस में हुए एक धार्मिक कार्यक्रम में बाबा के चरण छूने के चक्कर में मची भगदड़ में सैकड़ों श्रद्धालुओं की मौत के चलते समाज को गहरा सदमा लगा है। समाजसेवी पत्रकार डी पी गुप्ता ने इस घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए लिखा कि सनातन हिंदू धर्म में पंच देव और उनके अवतार के सिवा किसी और का पूजन शास्त्र विरूद्ध आचरण है। वर्तमान समय में हिंदू धर्म में तमाम ऐसे स्वयंभू बाबा हो गये हैं, जो कि अपने से प्रभावित जनता को वैदिक सिद्धांतों और परंपराओं के अनुसार भगवान व देवी देवताओं की पूजा पाठ का पालन करवाने की बजाय खुद की पूजा करवाने का एक पाखंड शुरू कर दिया जाता है जो कि अनुचित है। ऐसी कुपरंपरा के चलते स्वयंभू बाबाओं की चरण स्पर्श करने की उनके फालोवर्स को एक बड़ी ललक बनी रहती है । उन्हें लगता है कि वे उन बाबाओं का यदि दर्शन व चरण स्पर्श कर लेंगे तो उनके जीवन के कष्टों का निवारण हो जायेगा। ऐसी भ्रामक सोच के चलते ऐसे बाबाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भारी भीड़ इकट्ठा होती है। ऐसे बाबाओं द्वारा अपने फालोवर्स से शास्त्र सम्मत नियमों के पालन करवाने व देवी देवताओं की तस्वीर को महत्व नहीं दिया जाता है , बल्कि उनकी जगह खुद अपनी तस्वीर लगी लाकेट भक्तों के गले में लटकवाने को ज्यादा तरजीह दिया जाता है। भक्तों से शास्त्र अनुकूल भगवान राम-कृष्ण व पंचदेवों के पूजा करवाने की बजाय अपने तस्वीर की पूजा करवाये जाने को बढ़ावा दिया जाता है। ये बाबा खुद को एक स्वयंभू भगवान के रूप में स्थापित कर देते हैं। ऐसे बाबाओं के अनुयायी भी उन्हें साक्षात ईश्वरतुल्य मानने लगते हैं और वैदिक शास्त्रीय परंपरा को दरकिनार कर उन बाबाओं द्वारा बताये गये अशास्त्रीय धार्मिक कार्य करने लगते हैं, जिसका परिणाम अंततः दुखद् ही साबित होता है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में जगह जगह वर्णित है कि शास्त्र विरूद्ध ढंग से पूजा-पाठ करने वाले हर व्यक्ति को अंत में दुखद स्थिति का सामना करना पड़ेगा। हिंदू धर्म में फल-फूल चुकी इसी कुप्रथा के खिलाफ भारत वर्ष के विश्वविख्यात संत ब्रह्मलीन संत स्वामी रामसुख दास जी द्वारा जीवन पर्यंत अभियान चलाया गया। वे सभी भक्तों को भगवन्नाम से जोड़ने के कायल रहे। उनके द्वारा हिंदू भक्तों को सदैव शास्त्रीय परंपरा के अनुसार ईश्वर व देवी देवताओं की पूजा करने पर बल दिया गया। उन्होनें कैमरे से कभी अपनी तस्वीर नहीं खिंचवायी और न कोई लाकेट , फोटो ही बनवाया। आज की तारीख में उनकी कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं है। स्वामी रामसुख दास जी का ये मानना था कि यदि उनकी तस्वीर उपलब्ध होगी तो लोग उनकी तस्वीर को अपने घर के मंदिरों में भगवान राम कृष्ण के समांतर स्थापित कर देंगे जो उन्हें कतई मंजूर नहीं था। वे कभी नहीं चाहते थे कि लोग भगवान की पूजा करने की बजाय उनकी तस्वीर को महत्व दें। यहां तक उन्होंने अपनी एक वसीयत भी कर दी थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी कोई समाधि न बनवायी जाए और न ही उनके नाम पर कोई पूजा पाठ आदि किया जाए। भक्तगण सिर्फ भगवान की पूजा करें व्यक्ति की नहीं, यही उनका परम ध्येय था। वे सदैव यही चाहते थे कि हिंदू समुदाय उनके ज्ञान को ग्रहण कर सिर्फ भगवान का भजन करे। वैदिक शास्त्रों में वर्णन है कि संत महात्माओं को पूरा सम्मान दो ,लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वैदिक शास्त्रों वर्णित देवी देवताओं की उपेक्षा कर किसी बाबा को साक्षात देवता या भगवान मान लिया जाए। हिंदू धर्म में आज कल ये कुपरंपरा बहुत ज्यादा फैल गई है, कि ईश्वर की भक्ति का मार्ग बताने वाले बाबा अपने भक्तों में अपने प्रति अंधभक्ति पैदा कर उनसे ईश्वर की बजाय अपनी पूजा करवाने लगतें है। जो कि हिंदू शास्त्र के सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है। वक्त आ गया है कि हिंदू भक्तों को सही मार्ग दर्शन देने के लिए धार्मिक विशेषज्ञों की देखरेख में एक सनातन बोर्ड का गठन हो जो कि हिंदू धर्म में पनप रहे गैर शास्त्रीय पूजा पद्धति और पाखंडों का निवारण कर उन्हें वैदिक शास्त्रानुकूल दिशा दिखायें।

